Saturday, October 9, 2021

लड़कियों की शादी की उम्र कम से कम 21 वर्ष हो

हम अक्सर ये देखते हैं कि जिस किसी भी घर में 15 या 16 साल की लड़की हो जाये तो माता-पिता की चिंता की लकीरें माथे पर दिखने लगती हैं अब तो लड़की बड़ी हो गई है ब्याह कराना है। 18 साल होते ही उनके हाथ पीले हो जाते हैं चाहे लड़की आगे पढ़ना चाहे या खुद को जॉब में सेटल करना करना चाहे इन सब से माता-पिता को कोई लेना देना नहीं। हाँ.. ये बात अब 100 प्रतिशत तो नहीं है लेकिन अब भी ये बात अधिकतर देखा गया है और लड़कियों के भी दिमाग में बैठ गया है कि मैं तो अब 18 साल की हो गयी हूं और अब कानून भी नहीं रोक सकता है। हम अपनी मर्ज़ी से शादी कर सकते हैं। इस बात से माँ-बाप भी आहत होते हैं। बेशक आप कर सकते हैं लेकिन क्या उन्हें अपनी ज़िम्मेदारी का पूरा एहसास है तभी वो आगे बढ़ें अन्यथा ना ही ख़ुद से ऐसा कदम उठाएं और ना ही उनके माता-पिता कहीं भी इतनी कम उम्र में उनकी शादी कराएं। ऐसा क्यों कहा जा रहा है आइए जानते हैं।

18 साल से कम उम्र में लड़कियों की शादी करना कानूनन ज़ुर्म है लेकिन जैसे ही 18 साल की होती हैं उनके माता-पिता को या लड़कियों को खुली छूट मिल जाती है। जबकि 0-18 साल तक सब बच्चे होते हैं। अब ये तो अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत सभी ने माना है तो क्या जैसे ही बच्ची की उम्र 18 साल से ज़्यादा हुई वो पूरी तरह से तैयार है शादी के लिए क्योंकि तब तक तो पढ़ाई भी पूरी नहीं कर पाती हैं और ना ही वो खुद को पैरों पर खड़े होने जैसा बना पाती हैं तो क्या ऐसे में कम से कम 21 साल लड़कियों को नहीं मिलनी चाहिए। जब यूपीएससी की परिक्षा देने के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष होती है तो शादी के लिए 18 वर्ष क्यों? यहाँ तो महिला होने के नाते 18 साल में परिक्षा देने की अनुमति नहीं है। सबके लिए समान आयु सीमा है। 

यहाँ यूपीएससी से शादी की तुलना क्यों की?
यह समझने वाली बात है क्योंकि जब देश की ज़िम्मेदारी उठाने का सवाल आता है तब तैयारी और समझ दोनों ज़रूरी है लेकिन अगर ऐसे में कच्चे निकले तो देश का क्या होगा इसलिए पहले पूरी तैयारी उसके बाद परिक्षा और कई कठिन सवालों को पार करते हुए सफल होना? ठीक उसी प्रकार जब हम एक नई ज़िम्मेदारी को उठाने के लिए दो व्यक्तियों को आपस में मिलाते हैं तब एक उनका छोटा सा ख़ुद का समाज बनता है, देश बनता है या यूँ कहें कि पूरा संसार बनता है लेकिन ऐसे में माता-पिता की सोच क्यों नहीं बदली क्योंकि उन्होंने शब्दों पर कभी ध्यान आकर्षित नहीं किया। वो शब्द क्या हैं बताना ज़रूरी है कि "कम से कम" यही वो शब्द हैं 18 साल लड़की की शादी के लिए और 21 साल का लड़के का होना चाहिए। ऐसे में कम से कम कहा गया है ना कि इस उम्र का पडाव पार करते ही आप शादी के बंधन में बाँध दें। जब हम 18 साल की उम्र में होते हैं तो हमें सिर्फ़ मतदान करने का अधिकार प्राप्त है ना कि कोई मन्त्री बनने का क्योंकि वो भी एक ज़िम्मेदारियों से भरा हुआ काम है ऐसे में आप अपने घर को चलाने के लिए कितने ज़िम्मेदार हैं वो आपकी सोच पर निर्भर करेगा लेकिन जैसा कि मैंने कहा बिना समझ के बिना ज्ञान के कोई भी काम को ज़िम्मेदारी से नहीं निभाया जा सकता है। ऐसे में एक 18 साल के बच्ची को 19वें साल में कदम रखते ही किसी और के घर भेज देना या लड़कियों की उम्र से बहुत अधिक उम्र के लड़के से विवाह कराना शारीरिक रूप से भी नुकसानदेह है और सोच समझ ना मिलने के कारण उन्हें बहुत तकलीफ़ों का समाना करना पड़ता है। उसी तरह लड़कों को भी अपने मन के मुताबिक़ बात ना कर पाना भी आज के समय में आम समस्या बन गयी है और कहीं दूसरे व्यक्ति की तलाश में होते हैं ताकि अपनी समझ से मिलते जुलते लोग हों अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकें। अक्सर ये बातचीत में पाया गया है कि मेरी पत्नि मुझे समझती नहीं मैं क्या करूं किससे दिल की बात करूं तो भावनाओं का ना मिलना भी एक बहुत बड़ी समस्या है। महिलाओं का कहना होता है कि मेरे पति का दिमाग़ मुझसे नहीं मिलता। दोनों अलग अलग समझ रखते हैं और ये इस वजह से भी होता है कि उम्र के साथ हमारा मानव शरीर अलग-अलग उम्र में अलग-अलग हार्मोन को बनाता है। जो 20- 22 साल की लड़की एक शादी को लेकर जिस तरह उत्साहित होती है वो आगे चलकर 25 के बाद कुछ और ढंग से बात करेंगी और 30 के बाद कुछ और ढंग से अपनी बात को समझकर करने लगती हैं और ऐसा ही पुरुषों के साथ भी है। उम्र के साथ बदलते हार्मोंस ने उन्हें बहुत कुछ समझने और खुद को एक जिम्मेदारी की परख कराने में अहम भूमिका निभाता है। उम्र की परिपक्वता जीवन को आनन्दमय और सुखमय बनाता है। सही समय पर सही जानकारी और जिम्मेदारी का एहसास कराने में माता-पिता अपनी अहम भूमिका निभाएं और अपने बच्चों का जीवन सकारात्मक रूप में जीने का आधार बनाएं।

Monday, September 6, 2021

भला बलात्कार कोई मुद्दा है


संसार में लोग ना जाने कितने अपराध करते हैं। चाहे वह छोटी हो या बड़ी लेकिन उसकी कुछ ना कुछ सजा होती है मुआवजा होता है। उन अपराधों की श्रेणी में बलात्कार भी आता है जो जघन्य अपराध माना गया है। यह एक भारत की ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में इससे महिलाएँ अछूती नहीं हैं। यूँ कहें तो बलात्कार एक वैश्विक समस्या बन गयी है जिससे महिलाएं अब हर पल डर के साये में जी रहे हैं। उनको घर से जाने का पता तो होता है लेकिन वापस आने का नहीं होता है। कब कौन कहाँ से अपहरण कर लें या राह चलते छेड़छाड़ हो या उससे भी आगे की वारदात हो। कुछ भी कहा नहीं जा सकता। आज वो सुरक्षित कहीं भी महसूस नहीं कर रहीं हैं चाहे वो घर हो या बाहर, स्कूल हो या कॉलेज, निजी दफ्तर हो या सरकारी दफ्तर।  हर जगह उनका शोषण हो रहा है और इस पर कोई ठोस कदम उठाया ही नहीं गया है। अगर हम बात करें कि जब भी कोई घटना होती है और हमें पता चलता तो खून खौल जाता है और कुछ दिनों तक हम खूब चर्चा करते हैं साथ ही सोशल मीडिया पर भी भर-भर के लिखते हैं लेकिन क्या हफ्ते 10 दिन में सब ठीक हो जाता है? नहीं.. हो ही नहीं सकता यूँ चंद दिनों में क्योंकि हम फिर से अपने काम मे लग जाते हैं और दूसरी घटना का इन्तजार करने हैं कि जब ऐसा होगा तो फ़िर से मार्च निकालेंगे, मोमबत्तियां जाएंगे, आक्रोश दिखाएंगे और फिर अपने वही पुराने ढर्रे पर आ जाएंगे। लेकिन क्या कभी आपने इस पर शांत मन से सोचा है? कभी गंभीरता से इस पर गौर किया है? कुछ महसूस हुआ है? शायद नहीं.. तो आइये थोड़ा इस पर हम गौर फरमाते हैं।

आज सब लोग एक बार सोने से पहले आँख बन्द करके 5 से 10 मिनट तक सिर्फ़ ये सोचना कि अगर कल मैं राबिया की जगह हुई या मेरा कोई अपना हुआ तो.. कैसे मुझे दरिन्दे नोच-नोच कर अपनी हवस मिलाएँगे, कैसे.. कैसे.. मुझे तड़पा तड़पा कर काटा जाएगा, कैसे मुझे लोग बलात्कार कर रहे होंगे, कैसे चाकुओं से मेरे बदन के हर अंग को घोंप घोंप कर मारा जाएगा, मुझे जानवरों की तरह मेरे एक एक स्तन को बारी-बारी से काटा जाएगा, मैं तड़प रही होऊँगी, प्राइवेट पार्ट्स को काटेंगे, मैं चिल्लाती चीखती रहूँगी लेकिन कोई ना होगा बचाने वाला.. मरने के बाद भी चैन कहा से आएगा क्योंकि उसके बाद ही तो आचरण पर लांछन लगाया जाएगा फिर जो मन मे आएगा वही कहा जाएगा।

जनता क्या आवाज़ उठाएंगी मेरे लिए? भला क्यों उठाएंगी जनता मैं तो किसी के लिए नहीं बोल रहीं/ रहा हूँ।  मेरे लिए या मेरे परिवार के लिए कोई क्यों आवाज़ बुलंद करे? क्या पडी है इस मामले से? ये तो आम बात हो गयी है? हां.. आम होता है वो खास बन जाता है और ज्वलंत मुद्दा भी हल्के में लिया जाता है। 

पुलिस वाले भाई साहब कमाल करते हो पांडे जी.. बलात्कार क्या है ये तो मैडम होते रहता है यही काम रह गया है क्या हमारा? हम अपनी जिंदगी ना जिएं? मर जाए केस के पीछे भाग भाग के? हमारा भी एक परिवार है उनके साथ भी जीना है। भई ऐसा है जाओ आप आना बाद में अभी तो हमें चाय पकौड़े खाने दो..।

प्रधानमंत्री जी, मुख्यमंत्री जी, आयोग के अधिकारी जन सभी लोग अपने अपने महत्वपूर्ण कार्य में लगे हैं। आए दिन देश दुनिया भर की चिंता डुबाए जा रही है। क्या होगा दूसरे मुल्कों का? बहुत महत्त्वपूर्ण कार्यों में लगे हुए हैं भाई साहब बलात्कार क्या है ये तो आम बात है.. ये तो भाई होता रहेगा इस पर क्या बोलना या लिखाना है या क्यों परिवार वालों से मिलना है? जब वोट लेना होगा तो चलेंगे उनके फटेहाल जिंदगी में भी उनके पत्तेदार प्लेट पर हँसते हुए खाना खाएंगे और कहेंगे कि बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ और क्या बस हो गया हमारा काम.. बलात्कारियों को मंत्री बनाएंगे उनकी सत्ता में पकड बढ़ाएंगे ताकि बलात्कार का तूफ़ान थमे नहीं निरंतर चलता रहे और साथ ही महिलाओं को भी लाएंगे जो आगे चलकर ऐसे मुद्दे को चुपचाप देखती रहें और पीछे से सेक्स रैकेट चलाने में पूरा सहयोग दें उन्हीं को मंत्रिमंडल में बैठने का मौका मिलेगा। 

बेवक़ूफ़ लोग सालों से मेहनत कर के आईएएस/ईपीएस बनेंगे वो हमलोग को सलाम ठोकेंगे। मंत्री को क्या कोई पढ़ाई थोड़े करनी ज़रूरत है वो तो पढ़ें लिखे बेवक़ूफ़ लोग हमारे इशारे पर नाचेंगे। कुछ वीआईपी सुविधा देकर अपने हिसाब से करवाएंगे काम। बलात्कार क्या है भाई ऑफिसर तो सरकारी गुलाम है वो क्या बोलेगा? आका के इशारे का इन्तजार करेगा हुक्म का पालन करेगा।

मीडिया वाले भई.. वाह क्या कहने तुम्हारे... दूसरे मुल्कों में महिलाएं असुरक्षित हैं रेप हो रहा है।  सरकार उनकी सुनेगी नहीं बड़ा बुरा हाल है रे भैया... ओहो ओहो करते थक नहीं रहे हैं। अपने देश मे भी बुला लिया शरण देने के लिए अच्छी बात है। लेकिन क्या अपने देश मे महिलाएँ सुरक्षित हैं? इसपर कोई चर्चा नहीं। बलात्कार क्या है..? होता रहता है.. अब क्या ये कोई न्यूज दिखाने की है? भारत की छवी धूमिल हो जाएगी। ये सब नहीं दिखाना रे बाबा. . . ना.. ना.. ना.. जब तक लोग सड़कों पर नहीं आएंगे और जब तक लोग अनशन नहीं कर लेते तब तक ये सब क्यों करना? फ़िलहाल तो तालिबानी के पीछे पड़े रहना ठीक है बाकी मुद्दा भाड़ में जाए। बलात्कार मर्डर तो होते ही रहता है। जिसका कोई गया सो गया अपना काम बनाता भाड में जाए जनता।

भला बलात्कार कोई मुद्दा है.?

सोचिएगा

नेमत तौहीद ✍

Saturday, January 18, 2020

पढ़े-लिखे समाज में इतनी दरिंदगी... आख़िर क्यों?



आज मैं जिस मुद्दे पर आप सबके बीच अपने विचार रखने जा रही हूँ। दरअसल वो मुद्दा सदियों से चला आ रहा है लेकिन अब तक उस पर सही ढंग से चिंतन मंथन नहीं किया है। अब तो बातें भी थोड़ी होने लगी हैं जब शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव लाने और जागरूक करने की कोशिश की गई। महिलाओं के प्रति सम्मान और आदर की बातें उठने लगी। जी हाँ, आप सही समझ रहे हैं.. मैं उसी विषय में बात करने जा रही हूँ जो है 'सेक्स'! हालाँकि इस शब्द को मात्र बोलने से ही एक लड़का या लड़की बेशर्म, बेहया और बेग़ैरत का मुहर लगवा लेते हैं। बड़े बुज़ुर्ग और ये हमारा समाज जो समझते हुए भी अंजान बने हैं और बच्चों की ज़िन्दगी से खिलवाड़ करने वाले भी हमारे ही समाज के लोग हैं। ऐसा क्यों होता है आइये जानते हैं।
ऐसा इसलिए होता है कि जन्म के साथ ही लिंग भेद का पाठ पढ़ाया जाना आम बात है। हर बात की शिक्षा सिर्फ लड़कियों को दी जाती है तभी वो उम्र से पहले समझदार और विवेक से भरी होती हैं या यूँ कहें कि लड़कियों को सिर्फ दबाया और डराया गया है और किसी भी बात को रखना अपने मन में उठ रहे सवाल को भी कहना मुँहफट या बेशर्म की श्रेणी में रख दिया जाता है लेकिन उन पर घर से ही इतना दबाव पड़ता है कि वो बिना बताए ही बहुत कुछ समझने लगती हैं। कोई अलग से गुण नहीं होता। जैसी सोच पैदा करेंगे लड़के लड़कियां वैसा ही करेंगे। सोच बदलने पर ध्यान देना अति आवश्यक है। आज भी आप बैठकर अपने माता-पिता भाई-बहन से सहजता से सेक्स से जुड़ी समस्याओं पर बात नहीं करते होंगे उसके लिए एक प्रेमी/प्रेमिका या पति/पत्नि का सहारा लेंगे लेकिन कुछ बातें जो माँ-बाप और अपनों से सरल भाषा में मिलनी चाहिए आज भी वो समाज नहीं बन पाया है। मात्र सेक्स शब्द बोलना ही एक टैबू है जो मिटाना है। बाकी धीरे-धीरे कम होगा तब मानव विकृति की समस्या पर निजात पाया जा सकता है। उस तबके की बात करूँगी जो कहने को बहुत पढ़े-लिखे हैं फिर भी अब तक माहौल सही नहीं बना पाए हैं। बीमारी अगर सर्दी, खाँसी, बुख़ार हो या कैंसर इन सब पर बहुत अच्छे से चर्चा कर लेते हैं परिवार के लोग या ज़रूरत पड़ने पर पूरा समाज मिलकर। लेकिन हैरानी की बात ये है कि जब कोई लड़की या लड़का मानसिक तौर पर टूट रहे हों तो उसका इलाज़ या काउंसलिंग तो बहुत दूर की बात है उस पर सोच विचार तक नहीं करते। आखिर क्यों? सोचिएगा.. इस विषय पर चर्चा ना होने के कारण हम बच्चों को एक ऐसे परिवेश में धकेल दिए हैं जो मानसिक तौर पर कुंठित, संकुचित व विवेकहीन हो गए हैं। क्या ये विषय इतना संवेदनशील नहीं है? आज हर कोई डर के माहौल में जीने लगे हैं कि कब हमारी बेटी की आबरू तार तार हो जाए? कैसे बचाया जाए? लेकिन इसका विकल्प नहीं मिल पाया है। सिर्फ़ हम बेटियों को ही पढ़ाते और समझाते रहेंगे तो एक तरफ़ा कैसे काम चलेगा? बड़े ही ज़ोर शोर से आत्म सुरक्षा की ट्रेनिंग दी जा रही हैं लेकिन क्या आत्म निर्भर हो जाएँगी बेटियाँ? अपनी सुरक्षा अपने हाथ में हो ये अच्छी बात है लेकिन जब लड़कों को भी इसकी सही समय पर सही जानकारी दी जाए तो शायद ऐसा दिन ही ना आए जो सुनने को मिले कि आज एक लड़की के साथ जघन्य अपराध हुआ है। जैसा कि अध्ययन से पता चला है कि महिलाओं में सेक्स की इच्छा पुरुषों से अधिक होती है लेकिन बलात्कार करने के मामले में लड़कों का नाम ज़्यादा है लड़कियों का होना चाहिए था? लेकिन ऐसा नहीं है। सोचिये क्यों? बचपन से सीख मिलती है ऐसे रहना चाहिए वैसे रहना चाहिए तुम अब बड़ी हो गयी हो। इन बातों का ख़याल रखा करो। लेकिन क्या ऐसे शब्द कभी लड़कों को सुनने को मिलता है जितना दिन-रात लड़कियों को ट्रेनिंग मिलती है। अगर समाज को बदलना है खासकर महिलाओं पर हो रहे जघन्य अपराध को लेकर तो पहले आप सब अपने घरों में माहौल को बदलना शुरू करें। बच्चों के बीच उम्र के हिसाब से जानकारी देना शुरू करें। सोच को बदलने का प्रयास करें। हमारी शीरीरिक बनावट दो तरह की है लेकिन काम और क्रिया सब एक जैसे हैं। जिस तरह से बीमारी या फ़िटनेस को लेकर ख़ासा ख़्याल रखते हैं आप सबको बच्चों के प्रति मानसिक तनाव और उठने वाले हर सवाल का जवाब भी आप ही को बनना है ना कि कोई और उसे बताये। जब ये सब बातें ख़ास से आम नहीं बनेंगी तब तक हम सभ्य समाज का निर्माण नहीं कर सकते। लोग सोचते हैं कि इस पर बात करना असभ्य लोगों का काम है छी..छी.. लेकिन जब कोई घटना घट जाती है तब वाक़ई छी.. छी.. का रूप ले लेता है। सोचिए कि आपको कब छी.. छी.. सुनना सुनाना पसन्द होगा? सारे सवाल के जवाब आपके पास हैं। मेरा काम तो सिर्फ़ आईना दिखाना है। सोच बदलिए घर बदलेगा तभी समाज और देश बदलेगा।

Saturday, July 20, 2019

एक भूख ऐसी भी...


आज की भागती दौड़ती ज़िन्दगी में भी बच्चों के लिए माता पिता बहुत गम्भीर नज़र आते हैं। नवजात शिशु से लेकर १२ साल तक की उम्र तक बहुत ही अच्छे से ख़्याल रखते हैं और और हफ्ते महीने साल के अनुसार टीकाकरण भी कराते हैं ताकि हमारा बच्चा हष्ट पुष्ट तंदुरुस्त रहे और कोई बीमारी ना लगे। बीच बीच में बाल चिकित्सक से सलाह भी लेते हैं ताकि कोई आगे की परेशानी तो नहीं आएगी। उन्हें हमेशा ख़्याल रहता है। जब बच्चा ६ महीने का होता है तब उसे क्या खाना है क्या नहीं खाना है सब बाल चिकित्सक बताते हैं। अब आते हैं हम १२ साल के बाद की उम्र पर जो हम उन सभी इंजेक्शन को लगवाते हैं जिनसे कोई भयंकर बीमारी ना लगे। राष्ट्रीय टीकाकरण लिस्ट नीचे दिखाया गया है।




अब आते हैं हम उन बातों पर जब १२ साल बाद प्यूबर्टी शुरू हो जाती है लगभग सभी बच्चों का चाहे वो लड़का हो या लड़की। अब तो ९ साल की उम्र से भी शुरू हो जाता है। इस बारे में माता पिता गंभीरता नहीं दिखाते। बच्चों को अचानक से पता चलता है और वो घबरा जाते हैं कि। ये क्या हुआ? ये कौन सी बीमारी है? क्या मुझे बताना चाहिए माता पिता को? उनके अंदर बहुत सारे सवाल उठने शुरू हो जाते हैं। उसके बाद उनके शारीरिक विकास  होना और हार्मोन के बदलाव के कारण चिड़चिड़ापन, डर, गुस्सा या अकेले में ना जाने कैसे कैसे सवाल में उलझ जाना और फिर इन्टरनेट का सहारा लेना। कुछ बच्चे अपने दोस्तों में बताते हैं कि ऐसा हुआ तो वहां उन्हें सही जानकारी के बजाय उन पर मज़ाक बनाना शुरू या गलत सलाह भी मिल जाता है। कभी तो ऐसा भी होता है कि छोटी उम्र की लड़कियों को पब्लिक प्लेस या स्कूल में ही पीरियड्स आ जाता है वो घबरा जाती हैं और फिर सब उनका मज़ाक बनाते हैं। उस समय बच्चों के मस्तिक पर बहुत गहरा असर होता है। वो अकेले में रहना पसंद करने लगती हैं। ऐसे ही कुछ हाल लड़कों का भी होता है। वो भी बात से अनजान होते हैं और शर्म कहें या डर उनका वो किसी को बता नहीं पाते। जब बच्चे ख़ुद से जानने की कोशिश करते हैं तो उन्हें वो भी आर्टिकल या वीडियो देखने को मिल जाता है जो उम्र के मुताबिक सही नहीं होता है लेकिन फिर भी उसे देखना पढ़ना बहुत अच्छा लगने लगता है और फिर उस दलदल में धंसते चले जाते हैं जहां से बच्चों को निकाल पाना नामुमकिन सा हो जाता है। मानव मस्तिष्क में ऐसी विकृतियां पैदा होने लगती हैं कि वो सही गलत के बारे में सोच नहीं पाते हैं। जब वो अपनी बात को अपनों से कह नहीं पाते हैं तो कोई साथी कि तलाश होने लगती है। चाहे स्कूल का हो या कॉलेज का या कोई बाहरी। विपरीत लिंग के साथ बातें करना अच्छा लगने लगता है। अगर बच्चो के साथ अगर ज़्यादा सख्ती दिखाई जाती है तो वो उनसे अपनी बात को साझा करते हैं और उनसे इमोशनल सपोर्ट मिलता है और फिर आगे ऐसी घटना घट जाती है जो बच्चे समझ नहीं पाते। जो इमोशनल सपोर्ट करते हैं वहीं उनके साथ इंटीमेट हो जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि जब एक तरफ से डांट फटकार मिले या माता पिता सिर्फ माता पिता ही बन कर रह गए तो ऐसा बच्चों के साथ होना स्वाभाविक है। उन्हें प्यार और दुलार के साथ कुछ और भी चाइए जो है सही जानकारी। अगर सही जानकारी सही समय पर ना दी जाए तो यौन शोषण या बलात्कार जैसे जघन्य अपराध होते रहेंगे। एक वक़्त तक सिर्फ पेट में खाना खाने की भूख होती है लेकिन हार्मोन के बदलाव के बाद उन्हें किसी और चीज़ की भूख लगती है। वो है संभोग और ये स्वाभाविक है।



ऐसे में माता पिता को इसकी जानकारी देना चाहिए। उम्र जैसे जैसे बढ़ती जाती है वैसे वैसे उनके यौन विकास के ज्ञान को बढ़ाना भी माता पिता की ज़िम्मेदारी है। अगर हम ख़ुद से बताने में सक्षम नहीं हैं तो आप किसी और से जानकारी दिलाएं जो इनमें एक्सपर्ट हों। अगर हम १२ साल तक बल चिकित्सक तक लेे जा सकते हैं उनकी शारीरिक विकास और बीमारी रहित बनाने के लिए तो यौन शिक्षा की जानकारी के लिए क्यों नहीं? उनके मन में उठने वाले सारे सवाल का जवाब बिना पूछे मिल जाए तो गलत गलत कदम उठाने का सवाल ही नहीं पैदा होता। कब, कहां और कैसे इन सब की जानकारी मिल जाए तो शायद यौन शोषण और बलात्कार जैसे मामले काम होने लगेंगे। और वो दिन दूर नहीं जो हम समाज में बदलाव ना ला पाएं।


Tuesday, July 16, 2019

आख़िर लड़की ही दोषी क्यों?


मजबुर होकर लिखना पड़ा कि आखिर एक लड़की ही क्यों दोषी है? उसका भाई भी है और उसके माता पिता भी हैं कहीं ना कहीं। इस पोस्ट में जाती भेद से कोई लेना देना नहीं बल्कि उस मानसिकता की है जो कुंठित समाज और कुंठित परिवार में रहती है एक लड़की। जब वो ख़ुद से फ़ैसला लेने लगे तो ना जाने क्या क्या नहीं सहना पड़ता!!!

प्यार करना कोई गुनाह नहीं और ना ही प्रेम विवाह। लोग किस बात पर भड़क रहे हैं कि जाती दोनों की समान नहीं, लड़का बिगड़ैल पहले से शादी शुदा और उम्र में काफी बड़ा, अय्याश, ना जाने कितनी बुराइयां बताई जा रही है आज। ख़ैर कोई बात नहीं शादी का फ़ैसला तो लेे लिया दोनों ने। आज दोनों को मीडिया और कानून का सहारा लेना पड़ा क्योंकि उनके जान को ख़तरा है। इन सब की क्यों ज़रूरत पड़ी?

जब अजितेश गलत था तो उसके भाई का दोस्त कैसे था? क्यों नहीं सवाल उठाया गया कि ऐसे इंसान के साथ मत रहो बेटा ये तो अय्याश है बिगड़ैल है तुम अच्छे इंसान के साथ रहो। समाज ने भी लापरवाही दिखाई। कायदे से बेटा हो या बेटी साथी हमेशा अच्छा चुनने की सलाह दी जाती है तो बेटा के पक्ष में क्यों नहीं?

बेटी जब बड़ी होने लगी तो उसे मां बाप ने उसे सिर्फ बेटी क्यों समझा दोस्त क्यों नहीं माना? उसके मन में उठ रहे सवाल को क्यों नहीं समझाया? यौन शिक्षा की जानकारी नहीं दी माता पिता ने। सिर्फ माता पिता का काम डांटना नहीं बल्कि प्यार करना और साथ ही उसे हर छोटी बड़ी बात को समझाना उनका काम है लेकिन अब भी माता पिता सिर्फ खाना, कपड़ा, दवाई, शिक्षा और शादी के समय दहेज देकर एक लड़का खरीद कर दे देते हैं। ये है माता पिता का काम। बेटा हो या बेटी आपको दोनों के साथ वक़्त देना उनके मन में चल रहे सवाल पर उनके जवाब को देना ये भी माता पिता का काम है। अगर आपका बेटा या बेटी अपने माता पिता से अपनी बात खुलकर नहीं कर पाए तो वो माता पिता के रूप में असफल माने जाते हैं। सेक्स एजुकेशन कहां से लेते हैं? उनसे लेते हैं जो बाहरी होता है। प्रेमी प्रेमिका बनकर सीखते हैं बातें करते हैं और बातें उस चरम सीमा तक पहुंच जाती है कि या तो भागकर शादी कर लेते हैं या बिना शादी के शारीरिक सम्बंध बना लेते हैं। सही समय पर सही जानकारी दी जाए तो कोई बच्चा अपने माता पिता का नाम ख़राब नहीं कर सकता।

अब फिर से वही बात चर्चा में है कि कोंख में फिर से मारेंगे बेटियों को मां बाप ताकी बेटी ऐसे कदम ना उठाए। लेकिन क्या कोंख़ में मार देना समाधान है? सोचो, समझो और सोच को बदलो। कुछ और भी अहम काम है माता पिता का वो काम माता पिता ही करें वो ज़्यादा अच्छा है भविष्य के लिए।

नेमत

Thursday, June 6, 2019

ज़रूरी नहीं कि हर बार लड़का ही दोषी हो


आज मै एक लड़की होने के बावजूद एक लड़की के बारे में ऐसी घटना को साझा कर रही हूं जो बताना जरूरी लगा।

कल जब मैं एम्स हॉस्पिटल से लौट रही थी। मेट्रो ट्रेन में एक कपल की एंट्री होती है। लड़की ने मुझसे पूछा कि क्या ये ट्रेन चांदनी चौक जाएगी? मैंने कहा कि हां जाएगी। फिर एक अजीब सी हंसी के साथ अपने बॉयफ्रेंड को छूते हुए उसके कानों में कुछ कहा। वो लड़की बिना बात के हंसी और बार बार कुछ कहने के बहाने उस लड़के के क़रीब जाने लगी और जाना ये सब एक बहाना था। एक दो बार लड़के ने ये भी कहा कि सही से खड़ी हो जा.. फिर भी वो लड़की बाज नहीं आ रही थी। बस कुछ देर में उसने उसे पूरी तरह से जकड़ कर खड़ी हो गई। फिर क्या था.. कुछ लोग देख रहे थे तो कुछ लोग अपनी नज़रें नीचे तो कभी ऊपर.. वहां पर बुज़ुर्ग, जवान और बच्चे सभी थे। ना शर्म, ना लिहाज़, एकदम बेहयाई पर उतर आई। लड़का भी क्या करता बेचारा... बुजुर्ग की नज़रें कभी इधर तो कभी उधर, वहीं कुछ लोग लाइव रोमांस एन्जॉय कर रहे थे। मैं तस्वीर या विडियो लेना उचित नहीं समझी लेकिन इस घटना से मैं एक बात कहना चहूंगी कि हर बार लड़का ही गलत हो ये ज़रूरी नहीं।

हम कहते हैं रेप हो रहा है फांसी दो फांसी दो लेकिन इस कहानी में अगर लकड़ी के साथ शारीरिक संबध बन जाए फिर लड़का मुकर जाए शादी से तो क्या लड़का दोषी है? यही लड़की पुलिस के पास रिपोर्ट लिखाने जाएगी कि मेरा रेप हुआ है यौन शोषण हुआ है। लेकिन अब से इस तरह के मुद्दे पर सोच के बोलना होगा कि हर बार सिर्फ लड़का ही गलत हो.. जरूरी नहीं। ये लड़की अपना क़दम खुद से बढाई छूने देने का फिर अगर कुछ आगे का मामला बढ़ा तो लड़का रेपिस्ट हो गया।

बच्चे अपनी आंखो से देखकर क्या सीख ले रहे हैं? सोचिए आप सब भी कि हम आने वाले पीढ़ी को कैसा माहौल दे रहे हैं? जाने अंजाने उनको वक़्त से पहले ऐसी दलदल में डाल रहे हैं जिससे उनका बचपन अंधकार में जा रहा है।

महिलाओं को आज़ादी मिली है तो उसका सही  इस्तेमाल करें ना कि घर परिवार समाज और भारतीय संस्कृति पर आंच आने दें। आप हर काम के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन उसका सही ढंग से सदुपयोग करें।

नेमत

Thursday, May 23, 2019

सिर्फ़ महिला सशक्तिकरण ही क्यों पुरुष सशक्तिकरण क्यों नहीं?


आज महिलाएँ पुरुषों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर चल रही हैं। चाहे वो घर हो या दफ़्तर। महिलाओं को पहले की अपेक्षा अब और भी ज़्यादा काम करना पड़ता है जो कि पहले सिर्फ़ घर को ही संभालना होता था। महिलाओं को आगे लाया गया उनको सशक्त बनाया गया ताकि वो अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए दूसरे पर निर्भर ना रहें। बहुत हद तक महिलाओं को सशक्त बनाने में क़ामयाबी भी मिली। लेकिन सवाल ये उठता है कि आज घरेलू कामकाज़ के साथ-साथ बाहर पुरूषों की तरह 8 से 10 घण्टे की नौकरी करने के बाद जब घर में आती हैं तो फ़िर वही दुर्दशा है। आते ही घर के काम में लग जाना। उदाहरण के तौर पर बात करूं तो आज भी एक लड़की घर में दफ़्तर से आती है तो उसे अपने लिए एक ग्लास पानी से लेकर चाय और खाना सब कुछ स्वयं ही करना पड़ता है। क्योंकि वो एक महिला है। जब एक लड़का घर में आता है अपने दफ़्तर से तो उसके घर में अगर माँ हो, बहन हो या भाभी हो कोई भी हों लड़के के लिए पानी लाना, चाय बना कर देना, खाना परोस कर देना। ये आज भी हर घर के यही रीति रिवाज़ हैं। लेकिन महिला अगर बीमार हो या घर पर ना हों तब भी उस घर में पुरूष, दफ़्तर से आई महिला के लिए न पानी, न चाय और ना ही खाना परोस कर देते हैं। ये उदाहण सिर्फ़ एक उदाहरण नहीं है महिलाओं के अंदर की वो सम्वेदना है जो कहती हैं कि हमें बराबरी का हक़ तो मिला लेकिन इसके आड में बहुत अच्छे से शोषण भी किया जा रहा है। महिलाओं के काम को बढ़ा दिया गया घर के काम के साथ पैसे भी कमाओ लेकिन पुरुषों को ये बचपन से ये नहीं सिखाया गया कि आपको भी घर के कामकाज़ आने चाहिए। आप भी बरारबरी दिखाओ महिलाओं के साथ। तब बात सही मायनों में बराबरी का समझा जाएगा। ये तो महिलाओं को आगे बढ़ाकर सारे बोझ ही उनके सर पर डाल दिया गया है। आज जैसे महिला सशक्तिकरण का अभियान चलाया जा रहा है उसी तरह से पुरुष सशक्तिकरण का भी अभियान चलाया जाना चाइए। तभी हम गर्व से कह सकेंगे कि हमें बराबरी का दर्ज़ा मिला है अन्यथा ये महिलाओं के साथ अन्याय है।