हम अक्सर ये देखते हैं कि जिस किसी भी घर में 15 या 16 साल की लड़की हो जाये तो माता-पिता की चिंता की लकीरें माथे पर दिखने लगती हैं अब तो लड़की बड़ी हो गई है ब्याह कराना है। 18 साल होते ही उनके हाथ पीले हो जाते हैं चाहे लड़की आगे पढ़ना चाहे या खुद को जॉब में सेटल करना करना चाहे इन सब से माता-पिता को कोई लेना देना नहीं। हाँ.. ये बात अब 100 प्रतिशत तो नहीं है लेकिन अब भी ये बात अधिकतर देखा गया है और लड़कियों के भी दिमाग में बैठ गया है कि मैं तो अब 18 साल की हो गयी हूं और अब कानून भी नहीं रोक सकता है। हम अपनी मर्ज़ी से शादी कर सकते हैं। इस बात से माँ-बाप भी आहत होते हैं। बेशक आप कर सकते हैं लेकिन क्या उन्हें अपनी ज़िम्मेदारी का पूरा एहसास है तभी वो आगे बढ़ें अन्यथा ना ही ख़ुद से ऐसा कदम उठाएं और ना ही उनके माता-पिता कहीं भी इतनी कम उम्र में उनकी शादी कराएं। ऐसा क्यों कहा जा रहा है आइए जानते हैं।
नेमत की सोच
Saturday, October 9, 2021
लड़कियों की शादी की उम्र कम से कम 21 वर्ष हो
Monday, September 6, 2021
भला बलात्कार कोई मुद्दा है
संसार में लोग ना जाने कितने अपराध करते हैं। चाहे वह छोटी हो या बड़ी लेकिन उसकी कुछ ना कुछ सजा होती है मुआवजा होता है। उन अपराधों की श्रेणी में बलात्कार भी आता है जो जघन्य अपराध माना गया है। यह एक भारत की ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में इससे महिलाएँ अछूती नहीं हैं। यूँ कहें तो बलात्कार एक वैश्विक समस्या बन गयी है जिससे महिलाएं अब हर पल डर के साये में जी रहे हैं। उनको घर से जाने का पता तो होता है लेकिन वापस आने का नहीं होता है। कब कौन कहाँ से अपहरण कर लें या राह चलते छेड़छाड़ हो या उससे भी आगे की वारदात हो। कुछ भी कहा नहीं जा सकता। आज वो सुरक्षित कहीं भी महसूस नहीं कर रहीं हैं चाहे वो घर हो या बाहर, स्कूल हो या कॉलेज, निजी दफ्तर हो या सरकारी दफ्तर। हर जगह उनका शोषण हो रहा है और इस पर कोई ठोस कदम उठाया ही नहीं गया है। अगर हम बात करें कि जब भी कोई घटना होती है और हमें पता चलता तो खून खौल जाता है और कुछ दिनों तक हम खूब चर्चा करते हैं साथ ही सोशल मीडिया पर भी भर-भर के लिखते हैं लेकिन क्या हफ्ते 10 दिन में सब ठीक हो जाता है? नहीं.. हो ही नहीं सकता यूँ चंद दिनों में क्योंकि हम फिर से अपने काम मे लग जाते हैं और दूसरी घटना का इन्तजार करने हैं कि जब ऐसा होगा तो फ़िर से मार्च निकालेंगे, मोमबत्तियां जाएंगे, आक्रोश दिखाएंगे और फिर अपने वही पुराने ढर्रे पर आ जाएंगे। लेकिन क्या कभी आपने इस पर शांत मन से सोचा है? कभी गंभीरता से इस पर गौर किया है? कुछ महसूस हुआ है? शायद नहीं.. तो आइये थोड़ा इस पर हम गौर फरमाते हैं।
आज सब लोग एक बार सोने से पहले आँख बन्द करके 5 से 10 मिनट तक सिर्फ़ ये सोचना कि अगर कल मैं राबिया की जगह हुई या मेरा कोई अपना हुआ तो.. कैसे मुझे दरिन्दे नोच-नोच कर अपनी हवस मिलाएँगे, कैसे.. कैसे.. मुझे तड़पा तड़पा कर काटा जाएगा, कैसे मुझे लोग बलात्कार कर रहे होंगे, कैसे चाकुओं से मेरे बदन के हर अंग को घोंप घोंप कर मारा जाएगा, मुझे जानवरों की तरह मेरे एक एक स्तन को बारी-बारी से काटा जाएगा, मैं तड़प रही होऊँगी, प्राइवेट पार्ट्स को काटेंगे, मैं चिल्लाती चीखती रहूँगी लेकिन कोई ना होगा बचाने वाला.. मरने के बाद भी चैन कहा से आएगा क्योंकि उसके बाद ही तो आचरण पर लांछन लगाया जाएगा फिर जो मन मे आएगा वही कहा जाएगा।
जनता क्या आवाज़ उठाएंगी मेरे लिए? भला क्यों उठाएंगी जनता मैं तो किसी के लिए नहीं बोल रहीं/ रहा हूँ। मेरे लिए या मेरे परिवार के लिए कोई क्यों आवाज़ बुलंद करे? क्या पडी है इस मामले से? ये तो आम बात हो गयी है? हां.. आम होता है वो खास बन जाता है और ज्वलंत मुद्दा भी हल्के में लिया जाता है।
पुलिस वाले भाई साहब कमाल करते हो पांडे जी.. बलात्कार क्या है ये तो मैडम होते रहता है यही काम रह गया है क्या हमारा? हम अपनी जिंदगी ना जिएं? मर जाए केस के पीछे भाग भाग के? हमारा भी एक परिवार है उनके साथ भी जीना है। भई ऐसा है जाओ आप आना बाद में अभी तो हमें चाय पकौड़े खाने दो..।
प्रधानमंत्री जी, मुख्यमंत्री जी, आयोग के अधिकारी जन सभी लोग अपने अपने महत्वपूर्ण कार्य में लगे हैं। आए दिन देश दुनिया भर की चिंता डुबाए जा रही है। क्या होगा दूसरे मुल्कों का? बहुत महत्त्वपूर्ण कार्यों में लगे हुए हैं भाई साहब बलात्कार क्या है ये तो आम बात है.. ये तो भाई होता रहेगा इस पर क्या बोलना या लिखाना है या क्यों परिवार वालों से मिलना है? जब वोट लेना होगा तो चलेंगे उनके फटेहाल जिंदगी में भी उनके पत्तेदार प्लेट पर हँसते हुए खाना खाएंगे और कहेंगे कि बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ और क्या बस हो गया हमारा काम.. बलात्कारियों को मंत्री बनाएंगे उनकी सत्ता में पकड बढ़ाएंगे ताकि बलात्कार का तूफ़ान थमे नहीं निरंतर चलता रहे और साथ ही महिलाओं को भी लाएंगे जो आगे चलकर ऐसे मुद्दे को चुपचाप देखती रहें और पीछे से सेक्स रैकेट चलाने में पूरा सहयोग दें उन्हीं को मंत्रिमंडल में बैठने का मौका मिलेगा।
बेवक़ूफ़ लोग सालों से मेहनत कर के आईएएस/ईपीएस बनेंगे वो हमलोग को सलाम ठोकेंगे। मंत्री को क्या कोई पढ़ाई थोड़े करनी ज़रूरत है वो तो पढ़ें लिखे बेवक़ूफ़ लोग हमारे इशारे पर नाचेंगे। कुछ वीआईपी सुविधा देकर अपने हिसाब से करवाएंगे काम। बलात्कार क्या है भाई ऑफिसर तो सरकारी गुलाम है वो क्या बोलेगा? आका के इशारे का इन्तजार करेगा हुक्म का पालन करेगा।
मीडिया वाले भई.. वाह क्या कहने तुम्हारे... दूसरे मुल्कों में महिलाएं असुरक्षित हैं रेप हो रहा है। सरकार उनकी सुनेगी नहीं बड़ा बुरा हाल है रे भैया... ओहो ओहो करते थक नहीं रहे हैं। अपने देश मे भी बुला लिया शरण देने के लिए अच्छी बात है। लेकिन क्या अपने देश मे महिलाएँ सुरक्षित हैं? इसपर कोई चर्चा नहीं। बलात्कार क्या है..? होता रहता है.. अब क्या ये कोई न्यूज दिखाने की है? भारत की छवी धूमिल हो जाएगी। ये सब नहीं दिखाना रे बाबा. . . ना.. ना.. ना.. जब तक लोग सड़कों पर नहीं आएंगे और जब तक लोग अनशन नहीं कर लेते तब तक ये सब क्यों करना? फ़िलहाल तो तालिबानी के पीछे पड़े रहना ठीक है बाकी मुद्दा भाड़ में जाए। बलात्कार मर्डर तो होते ही रहता है। जिसका कोई गया सो गया अपना काम बनाता भाड में जाए जनता।
भला बलात्कार कोई मुद्दा है.?
सोचिएगा
नेमत तौहीद ✍
Saturday, January 18, 2020
पढ़े-लिखे समाज में इतनी दरिंदगी... आख़िर क्यों?
ऐसा इसलिए होता है कि जन्म के साथ ही लिंग भेद का पाठ पढ़ाया जाना आम बात है। हर बात की शिक्षा सिर्फ लड़कियों को दी जाती है तभी वो उम्र से पहले समझदार और विवेक से भरी होती हैं या यूँ कहें कि लड़कियों को सिर्फ दबाया और डराया गया है और किसी भी बात को रखना अपने मन में उठ रहे सवाल को भी कहना मुँहफट या बेशर्म की श्रेणी में रख दिया जाता है लेकिन उन पर घर से ही इतना दबाव पड़ता है कि वो बिना बताए ही बहुत कुछ समझने लगती हैं। कोई अलग से गुण नहीं होता। जैसी सोच पैदा करेंगे लड़के लड़कियां वैसा ही करेंगे। सोच बदलने पर ध्यान देना अति आवश्यक है। आज भी आप बैठकर अपने माता-पिता भाई-बहन से सहजता से सेक्स से जुड़ी समस्याओं पर बात नहीं करते होंगे उसके लिए एक प्रेमी/प्रेमिका या पति/पत्नि का सहारा लेंगे लेकिन कुछ बातें जो माँ-बाप और अपनों से सरल भाषा में मिलनी चाहिए आज भी वो समाज नहीं बन पाया है। मात्र सेक्स शब्द बोलना ही एक टैबू है जो मिटाना है। बाकी धीरे-धीरे कम होगा तब मानव विकृति की समस्या पर निजात पाया जा सकता है। उस तबके की बात करूँगी जो कहने को बहुत पढ़े-लिखे हैं फिर भी अब तक माहौल सही नहीं बना पाए हैं। बीमारी अगर सर्दी, खाँसी, बुख़ार हो या कैंसर इन सब पर बहुत अच्छे से चर्चा कर लेते हैं परिवार के लोग या ज़रूरत पड़ने पर पूरा समाज मिलकर। लेकिन हैरानी की बात ये है कि जब कोई लड़की या लड़का मानसिक तौर पर टूट रहे हों तो उसका इलाज़ या काउंसलिंग तो बहुत दूर की बात है उस पर सोच विचार तक नहीं करते। आखिर क्यों? सोचिएगा.. इस विषय पर चर्चा ना होने के कारण हम बच्चों को एक ऐसे परिवेश में धकेल दिए हैं जो मानसिक तौर पर कुंठित, संकुचित व विवेकहीन हो गए हैं। क्या ये विषय इतना संवेदनशील नहीं है? आज हर कोई डर के माहौल में जीने लगे हैं कि कब हमारी बेटी की आबरू तार तार हो जाए? कैसे बचाया जाए? लेकिन इसका विकल्प नहीं मिल पाया है। सिर्फ़ हम बेटियों को ही पढ़ाते और समझाते रहेंगे तो एक तरफ़ा कैसे काम चलेगा? बड़े ही ज़ोर शोर से आत्म सुरक्षा की ट्रेनिंग दी जा रही हैं लेकिन क्या आत्म निर्भर हो जाएँगी बेटियाँ? अपनी सुरक्षा अपने हाथ में हो ये अच्छी बात है लेकिन जब लड़कों को भी इसकी सही समय पर सही जानकारी दी जाए तो शायद ऐसा दिन ही ना आए जो सुनने को मिले कि आज एक लड़की के साथ जघन्य अपराध हुआ है। जैसा कि अध्ययन से पता चला है कि महिलाओं में सेक्स की इच्छा पुरुषों से अधिक होती है लेकिन बलात्कार करने के मामले में लड़कों का नाम ज़्यादा है लड़कियों का होना चाहिए था? लेकिन ऐसा नहीं है। सोचिये क्यों? बचपन से सीख मिलती है ऐसे रहना चाहिए वैसे रहना चाहिए तुम अब बड़ी हो गयी हो। इन बातों का ख़याल रखा करो। लेकिन क्या ऐसे शब्द कभी लड़कों को सुनने को मिलता है जितना दिन-रात लड़कियों को ट्रेनिंग मिलती है। अगर समाज को बदलना है खासकर महिलाओं पर हो रहे जघन्य अपराध को लेकर तो पहले आप सब अपने घरों में माहौल को बदलना शुरू करें। बच्चों के बीच उम्र के हिसाब से जानकारी देना शुरू करें। सोच को बदलने का प्रयास करें। हमारी शीरीरिक बनावट दो तरह की है लेकिन काम और क्रिया सब एक जैसे हैं। जिस तरह से बीमारी या फ़िटनेस को लेकर ख़ासा ख़्याल रखते हैं आप सबको बच्चों के प्रति मानसिक तनाव और उठने वाले हर सवाल का जवाब भी आप ही को बनना है ना कि कोई और उसे बताये। जब ये सब बातें ख़ास से आम नहीं बनेंगी तब तक हम सभ्य समाज का निर्माण नहीं कर सकते। लोग सोचते हैं कि इस पर बात करना असभ्य लोगों का काम है छी..छी.. लेकिन जब कोई घटना घट जाती है तब वाक़ई छी.. छी.. का रूप ले लेता है। सोचिए कि आपको कब छी.. छी.. सुनना सुनाना पसन्द होगा? सारे सवाल के जवाब आपके पास हैं। मेरा काम तो सिर्फ़ आईना दिखाना है। सोच बदलिए घर बदलेगा तभी समाज और देश बदलेगा।
Saturday, July 20, 2019
एक भूख ऐसी भी...
आज की भागती दौड़ती ज़िन्दगी में भी बच्चों के लिए माता पिता बहुत गम्भीर नज़र आते हैं। नवजात शिशु से लेकर १२ साल तक की उम्र तक बहुत ही अच्छे से ख़्याल रखते हैं और और हफ्ते महीने साल के अनुसार टीकाकरण भी कराते हैं ताकि हमारा बच्चा हष्ट पुष्ट तंदुरुस्त रहे और कोई बीमारी ना लगे। बीच बीच में बाल चिकित्सक से सलाह भी लेते हैं ताकि कोई आगे की परेशानी तो नहीं आएगी। उन्हें हमेशा ख़्याल रहता है। जब बच्चा ६ महीने का होता है तब उसे क्या खाना है क्या नहीं खाना है सब बाल चिकित्सक बताते हैं। अब आते हैं हम १२ साल के बाद की उम्र पर जो हम उन सभी इंजेक्शन को लगवाते हैं जिनसे कोई भयंकर बीमारी ना लगे। राष्ट्रीय टीकाकरण लिस्ट नीचे दिखाया गया है।
Tuesday, July 16, 2019
आख़िर लड़की ही दोषी क्यों?
मजबुर होकर लिखना पड़ा कि आखिर एक लड़की ही क्यों दोषी है? उसका भाई भी है और उसके माता पिता भी हैं कहीं ना कहीं। इस पोस्ट में जाती भेद से कोई लेना देना नहीं बल्कि उस मानसिकता की है जो कुंठित समाज और कुंठित परिवार में रहती है एक लड़की। जब वो ख़ुद से फ़ैसला लेने लगे तो ना जाने क्या क्या नहीं सहना पड़ता!!!
प्यार करना कोई गुनाह नहीं और ना ही प्रेम विवाह। लोग किस बात पर भड़क रहे हैं कि जाती दोनों की समान नहीं, लड़का बिगड़ैल पहले से शादी शुदा और उम्र में काफी बड़ा, अय्याश, ना जाने कितनी बुराइयां बताई जा रही है आज। ख़ैर कोई बात नहीं शादी का फ़ैसला तो लेे लिया दोनों ने। आज दोनों को मीडिया और कानून का सहारा लेना पड़ा क्योंकि उनके जान को ख़तरा है। इन सब की क्यों ज़रूरत पड़ी?
जब अजितेश गलत था तो उसके भाई का दोस्त कैसे था? क्यों नहीं सवाल उठाया गया कि ऐसे इंसान के साथ मत रहो बेटा ये तो अय्याश है बिगड़ैल है तुम अच्छे इंसान के साथ रहो। समाज ने भी लापरवाही दिखाई। कायदे से बेटा हो या बेटी साथी हमेशा अच्छा चुनने की सलाह दी जाती है तो बेटा के पक्ष में क्यों नहीं?
बेटी जब बड़ी होने लगी तो उसे मां बाप ने उसे सिर्फ बेटी क्यों समझा दोस्त क्यों नहीं माना? उसके मन में उठ रहे सवाल को क्यों नहीं समझाया? यौन शिक्षा की जानकारी नहीं दी माता पिता ने। सिर्फ माता पिता का काम डांटना नहीं बल्कि प्यार करना और साथ ही उसे हर छोटी बड़ी बात को समझाना उनका काम है लेकिन अब भी माता पिता सिर्फ खाना, कपड़ा, दवाई, शिक्षा और शादी के समय दहेज देकर एक लड़का खरीद कर दे देते हैं। ये है माता पिता का काम। बेटा हो या बेटी आपको दोनों के साथ वक़्त देना उनके मन में चल रहे सवाल पर उनके जवाब को देना ये भी माता पिता का काम है। अगर आपका बेटा या बेटी अपने माता पिता से अपनी बात खुलकर नहीं कर पाए तो वो माता पिता के रूप में असफल माने जाते हैं। सेक्स एजुकेशन कहां से लेते हैं? उनसे लेते हैं जो बाहरी होता है। प्रेमी प्रेमिका बनकर सीखते हैं बातें करते हैं और बातें उस चरम सीमा तक पहुंच जाती है कि या तो भागकर शादी कर लेते हैं या बिना शादी के शारीरिक सम्बंध बना लेते हैं। सही समय पर सही जानकारी दी जाए तो कोई बच्चा अपने माता पिता का नाम ख़राब नहीं कर सकता।
अब फिर से वही बात चर्चा में है कि कोंख में फिर से मारेंगे बेटियों को मां बाप ताकी बेटी ऐसे कदम ना उठाए। लेकिन क्या कोंख़ में मार देना समाधान है? सोचो, समझो और सोच को बदलो। कुछ और भी अहम काम है माता पिता का वो काम माता पिता ही करें वो ज़्यादा अच्छा है भविष्य के लिए।
नेमत
Thursday, June 6, 2019
ज़रूरी नहीं कि हर बार लड़का ही दोषी हो
आज मै एक लड़की होने के बावजूद एक लड़की के बारे में ऐसी घटना को साझा कर रही हूं जो बताना जरूरी लगा।
कल जब मैं एम्स हॉस्पिटल से लौट रही थी। मेट्रो ट्रेन में एक कपल की एंट्री होती है। लड़की ने मुझसे पूछा कि क्या ये ट्रेन चांदनी चौक जाएगी? मैंने कहा कि हां जाएगी। फिर एक अजीब सी हंसी के साथ अपने बॉयफ्रेंड को छूते हुए उसके कानों में कुछ कहा। वो लड़की बिना बात के हंसी और बार बार कुछ कहने के बहाने उस लड़के के क़रीब जाने लगी और जाना ये सब एक बहाना था। एक दो बार लड़के ने ये भी कहा कि सही से खड़ी हो जा.. फिर भी वो लड़की बाज नहीं आ रही थी। बस कुछ देर में उसने उसे पूरी तरह से जकड़ कर खड़ी हो गई। फिर क्या था.. कुछ लोग देख रहे थे तो कुछ लोग अपनी नज़रें नीचे तो कभी ऊपर.. वहां पर बुज़ुर्ग, जवान और बच्चे सभी थे। ना शर्म, ना लिहाज़, एकदम बेहयाई पर उतर आई। लड़का भी क्या करता बेचारा... बुजुर्ग की नज़रें कभी इधर तो कभी उधर, वहीं कुछ लोग लाइव रोमांस एन्जॉय कर रहे थे। मैं तस्वीर या विडियो लेना उचित नहीं समझी लेकिन इस घटना से मैं एक बात कहना चहूंगी कि हर बार लड़का ही गलत हो ये ज़रूरी नहीं।
हम कहते हैं रेप हो रहा है फांसी दो फांसी दो लेकिन इस कहानी में अगर लकड़ी के साथ शारीरिक संबध बन जाए फिर लड़का मुकर जाए शादी से तो क्या लड़का दोषी है? यही लड़की पुलिस के पास रिपोर्ट लिखाने जाएगी कि मेरा रेप हुआ है यौन शोषण हुआ है। लेकिन अब से इस तरह के मुद्दे पर सोच के बोलना होगा कि हर बार सिर्फ लड़का ही गलत हो.. जरूरी नहीं। ये लड़की अपना क़दम खुद से बढाई छूने देने का फिर अगर कुछ आगे का मामला बढ़ा तो लड़का रेपिस्ट हो गया।
बच्चे अपनी आंखो से देखकर क्या सीख ले रहे हैं? सोचिए आप सब भी कि हम आने वाले पीढ़ी को कैसा माहौल दे रहे हैं? जाने अंजाने उनको वक़्त से पहले ऐसी दलदल में डाल रहे हैं जिससे उनका बचपन अंधकार में जा रहा है।
महिलाओं को आज़ादी मिली है तो उसका सही इस्तेमाल करें ना कि घर परिवार समाज और भारतीय संस्कृति पर आंच आने दें। आप हर काम के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन उसका सही ढंग से सदुपयोग करें।
नेमत








