Saturday, July 20, 2019

एक भूख ऐसी भी...


आज की भागती दौड़ती ज़िन्दगी में भी बच्चों के लिए माता पिता बहुत गम्भीर नज़र आते हैं। नवजात शिशु से लेकर १२ साल तक की उम्र तक बहुत ही अच्छे से ख़्याल रखते हैं और और हफ्ते महीने साल के अनुसार टीकाकरण भी कराते हैं ताकि हमारा बच्चा हष्ट पुष्ट तंदुरुस्त रहे और कोई बीमारी ना लगे। बीच बीच में बाल चिकित्सक से सलाह भी लेते हैं ताकि कोई आगे की परेशानी तो नहीं आएगी। उन्हें हमेशा ख़्याल रहता है। जब बच्चा ६ महीने का होता है तब उसे क्या खाना है क्या नहीं खाना है सब बाल चिकित्सक बताते हैं। अब आते हैं हम १२ साल के बाद की उम्र पर जो हम उन सभी इंजेक्शन को लगवाते हैं जिनसे कोई भयंकर बीमारी ना लगे। राष्ट्रीय टीकाकरण लिस्ट नीचे दिखाया गया है।




अब आते हैं हम उन बातों पर जब १२ साल बाद प्यूबर्टी शुरू हो जाती है लगभग सभी बच्चों का चाहे वो लड़का हो या लड़की। अब तो ९ साल की उम्र से भी शुरू हो जाता है। इस बारे में माता पिता गंभीरता नहीं दिखाते। बच्चों को अचानक से पता चलता है और वो घबरा जाते हैं कि। ये क्या हुआ? ये कौन सी बीमारी है? क्या मुझे बताना चाहिए माता पिता को? उनके अंदर बहुत सारे सवाल उठने शुरू हो जाते हैं। उसके बाद उनके शारीरिक विकास  होना और हार्मोन के बदलाव के कारण चिड़चिड़ापन, डर, गुस्सा या अकेले में ना जाने कैसे कैसे सवाल में उलझ जाना और फिर इन्टरनेट का सहारा लेना। कुछ बच्चे अपने दोस्तों में बताते हैं कि ऐसा हुआ तो वहां उन्हें सही जानकारी के बजाय उन पर मज़ाक बनाना शुरू या गलत सलाह भी मिल जाता है। कभी तो ऐसा भी होता है कि छोटी उम्र की लड़कियों को पब्लिक प्लेस या स्कूल में ही पीरियड्स आ जाता है वो घबरा जाती हैं और फिर सब उनका मज़ाक बनाते हैं। उस समय बच्चों के मस्तिक पर बहुत गहरा असर होता है। वो अकेले में रहना पसंद करने लगती हैं। ऐसे ही कुछ हाल लड़कों का भी होता है। वो भी बात से अनजान होते हैं और शर्म कहें या डर उनका वो किसी को बता नहीं पाते। जब बच्चे ख़ुद से जानने की कोशिश करते हैं तो उन्हें वो भी आर्टिकल या वीडियो देखने को मिल जाता है जो उम्र के मुताबिक सही नहीं होता है लेकिन फिर भी उसे देखना पढ़ना बहुत अच्छा लगने लगता है और फिर उस दलदल में धंसते चले जाते हैं जहां से बच्चों को निकाल पाना नामुमकिन सा हो जाता है। मानव मस्तिष्क में ऐसी विकृतियां पैदा होने लगती हैं कि वो सही गलत के बारे में सोच नहीं पाते हैं। जब वो अपनी बात को अपनों से कह नहीं पाते हैं तो कोई साथी कि तलाश होने लगती है। चाहे स्कूल का हो या कॉलेज का या कोई बाहरी। विपरीत लिंग के साथ बातें करना अच्छा लगने लगता है। अगर बच्चो के साथ अगर ज़्यादा सख्ती दिखाई जाती है तो वो उनसे अपनी बात को साझा करते हैं और उनसे इमोशनल सपोर्ट मिलता है और फिर आगे ऐसी घटना घट जाती है जो बच्चे समझ नहीं पाते। जो इमोशनल सपोर्ट करते हैं वहीं उनके साथ इंटीमेट हो जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि जब एक तरफ से डांट फटकार मिले या माता पिता सिर्फ माता पिता ही बन कर रह गए तो ऐसा बच्चों के साथ होना स्वाभाविक है। उन्हें प्यार और दुलार के साथ कुछ और भी चाइए जो है सही जानकारी। अगर सही जानकारी सही समय पर ना दी जाए तो यौन शोषण या बलात्कार जैसे जघन्य अपराध होते रहेंगे। एक वक़्त तक सिर्फ पेट में खाना खाने की भूख होती है लेकिन हार्मोन के बदलाव के बाद उन्हें किसी और चीज़ की भूख लगती है। वो है संभोग और ये स्वाभाविक है।



ऐसे में माता पिता को इसकी जानकारी देना चाहिए। उम्र जैसे जैसे बढ़ती जाती है वैसे वैसे उनके यौन विकास के ज्ञान को बढ़ाना भी माता पिता की ज़िम्मेदारी है। अगर हम ख़ुद से बताने में सक्षम नहीं हैं तो आप किसी और से जानकारी दिलाएं जो इनमें एक्सपर्ट हों। अगर हम १२ साल तक बल चिकित्सक तक लेे जा सकते हैं उनकी शारीरिक विकास और बीमारी रहित बनाने के लिए तो यौन शिक्षा की जानकारी के लिए क्यों नहीं? उनके मन में उठने वाले सारे सवाल का जवाब बिना पूछे मिल जाए तो गलत गलत कदम उठाने का सवाल ही नहीं पैदा होता। कब, कहां और कैसे इन सब की जानकारी मिल जाए तो शायद यौन शोषण और बलात्कार जैसे मामले काम होने लगेंगे। और वो दिन दूर नहीं जो हम समाज में बदलाव ना ला पाएं।


Tuesday, July 16, 2019

आख़िर लड़की ही दोषी क्यों?


मजबुर होकर लिखना पड़ा कि आखिर एक लड़की ही क्यों दोषी है? उसका भाई भी है और उसके माता पिता भी हैं कहीं ना कहीं। इस पोस्ट में जाती भेद से कोई लेना देना नहीं बल्कि उस मानसिकता की है जो कुंठित समाज और कुंठित परिवार में रहती है एक लड़की। जब वो ख़ुद से फ़ैसला लेने लगे तो ना जाने क्या क्या नहीं सहना पड़ता!!!

प्यार करना कोई गुनाह नहीं और ना ही प्रेम विवाह। लोग किस बात पर भड़क रहे हैं कि जाती दोनों की समान नहीं, लड़का बिगड़ैल पहले से शादी शुदा और उम्र में काफी बड़ा, अय्याश, ना जाने कितनी बुराइयां बताई जा रही है आज। ख़ैर कोई बात नहीं शादी का फ़ैसला तो लेे लिया दोनों ने। आज दोनों को मीडिया और कानून का सहारा लेना पड़ा क्योंकि उनके जान को ख़तरा है। इन सब की क्यों ज़रूरत पड़ी?

जब अजितेश गलत था तो उसके भाई का दोस्त कैसे था? क्यों नहीं सवाल उठाया गया कि ऐसे इंसान के साथ मत रहो बेटा ये तो अय्याश है बिगड़ैल है तुम अच्छे इंसान के साथ रहो। समाज ने भी लापरवाही दिखाई। कायदे से बेटा हो या बेटी साथी हमेशा अच्छा चुनने की सलाह दी जाती है तो बेटा के पक्ष में क्यों नहीं?

बेटी जब बड़ी होने लगी तो उसे मां बाप ने उसे सिर्फ बेटी क्यों समझा दोस्त क्यों नहीं माना? उसके मन में उठ रहे सवाल को क्यों नहीं समझाया? यौन शिक्षा की जानकारी नहीं दी माता पिता ने। सिर्फ माता पिता का काम डांटना नहीं बल्कि प्यार करना और साथ ही उसे हर छोटी बड़ी बात को समझाना उनका काम है लेकिन अब भी माता पिता सिर्फ खाना, कपड़ा, दवाई, शिक्षा और शादी के समय दहेज देकर एक लड़का खरीद कर दे देते हैं। ये है माता पिता का काम। बेटा हो या बेटी आपको दोनों के साथ वक़्त देना उनके मन में चल रहे सवाल पर उनके जवाब को देना ये भी माता पिता का काम है। अगर आपका बेटा या बेटी अपने माता पिता से अपनी बात खुलकर नहीं कर पाए तो वो माता पिता के रूप में असफल माने जाते हैं। सेक्स एजुकेशन कहां से लेते हैं? उनसे लेते हैं जो बाहरी होता है। प्रेमी प्रेमिका बनकर सीखते हैं बातें करते हैं और बातें उस चरम सीमा तक पहुंच जाती है कि या तो भागकर शादी कर लेते हैं या बिना शादी के शारीरिक सम्बंध बना लेते हैं। सही समय पर सही जानकारी दी जाए तो कोई बच्चा अपने माता पिता का नाम ख़राब नहीं कर सकता।

अब फिर से वही बात चर्चा में है कि कोंख में फिर से मारेंगे बेटियों को मां बाप ताकी बेटी ऐसे कदम ना उठाए। लेकिन क्या कोंख़ में मार देना समाधान है? सोचो, समझो और सोच को बदलो। कुछ और भी अहम काम है माता पिता का वो काम माता पिता ही करें वो ज़्यादा अच्छा है भविष्य के लिए।

नेमत

Thursday, June 6, 2019

ज़रूरी नहीं कि हर बार लड़का ही दोषी हो


आज मै एक लड़की होने के बावजूद एक लड़की के बारे में ऐसी घटना को साझा कर रही हूं जो बताना जरूरी लगा।

कल जब मैं एम्स हॉस्पिटल से लौट रही थी। मेट्रो ट्रेन में एक कपल की एंट्री होती है। लड़की ने मुझसे पूछा कि क्या ये ट्रेन चांदनी चौक जाएगी? मैंने कहा कि हां जाएगी। फिर एक अजीब सी हंसी के साथ अपने बॉयफ्रेंड को छूते हुए उसके कानों में कुछ कहा। वो लड़की बिना बात के हंसी और बार बार कुछ कहने के बहाने उस लड़के के क़रीब जाने लगी और जाना ये सब एक बहाना था। एक दो बार लड़के ने ये भी कहा कि सही से खड़ी हो जा.. फिर भी वो लड़की बाज नहीं आ रही थी। बस कुछ देर में उसने उसे पूरी तरह से जकड़ कर खड़ी हो गई। फिर क्या था.. कुछ लोग देख रहे थे तो कुछ लोग अपनी नज़रें नीचे तो कभी ऊपर.. वहां पर बुज़ुर्ग, जवान और बच्चे सभी थे। ना शर्म, ना लिहाज़, एकदम बेहयाई पर उतर आई। लड़का भी क्या करता बेचारा... बुजुर्ग की नज़रें कभी इधर तो कभी उधर, वहीं कुछ लोग लाइव रोमांस एन्जॉय कर रहे थे। मैं तस्वीर या विडियो लेना उचित नहीं समझी लेकिन इस घटना से मैं एक बात कहना चहूंगी कि हर बार लड़का ही गलत हो ये ज़रूरी नहीं।

हम कहते हैं रेप हो रहा है फांसी दो फांसी दो लेकिन इस कहानी में अगर लकड़ी के साथ शारीरिक संबध बन जाए फिर लड़का मुकर जाए शादी से तो क्या लड़का दोषी है? यही लड़की पुलिस के पास रिपोर्ट लिखाने जाएगी कि मेरा रेप हुआ है यौन शोषण हुआ है। लेकिन अब से इस तरह के मुद्दे पर सोच के बोलना होगा कि हर बार सिर्फ लड़का ही गलत हो.. जरूरी नहीं। ये लड़की अपना क़दम खुद से बढाई छूने देने का फिर अगर कुछ आगे का मामला बढ़ा तो लड़का रेपिस्ट हो गया।

बच्चे अपनी आंखो से देखकर क्या सीख ले रहे हैं? सोचिए आप सब भी कि हम आने वाले पीढ़ी को कैसा माहौल दे रहे हैं? जाने अंजाने उनको वक़्त से पहले ऐसी दलदल में डाल रहे हैं जिससे उनका बचपन अंधकार में जा रहा है।

महिलाओं को आज़ादी मिली है तो उसका सही  इस्तेमाल करें ना कि घर परिवार समाज और भारतीय संस्कृति पर आंच आने दें। आप हर काम के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन उसका सही ढंग से सदुपयोग करें।

नेमत

Thursday, May 23, 2019

सिर्फ़ महिला सशक्तिकरण ही क्यों पुरुष सशक्तिकरण क्यों नहीं?


आज महिलाएँ पुरुषों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर चल रही हैं। चाहे वो घर हो या दफ़्तर। महिलाओं को पहले की अपेक्षा अब और भी ज़्यादा काम करना पड़ता है जो कि पहले सिर्फ़ घर को ही संभालना होता था। महिलाओं को आगे लाया गया उनको सशक्त बनाया गया ताकि वो अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए दूसरे पर निर्भर ना रहें। बहुत हद तक महिलाओं को सशक्त बनाने में क़ामयाबी भी मिली। लेकिन सवाल ये उठता है कि आज घरेलू कामकाज़ के साथ-साथ बाहर पुरूषों की तरह 8 से 10 घण्टे की नौकरी करने के बाद जब घर में आती हैं तो फ़िर वही दुर्दशा है। आते ही घर के काम में लग जाना। उदाहरण के तौर पर बात करूं तो आज भी एक लड़की घर में दफ़्तर से आती है तो उसे अपने लिए एक ग्लास पानी से लेकर चाय और खाना सब कुछ स्वयं ही करना पड़ता है। क्योंकि वो एक महिला है। जब एक लड़का घर में आता है अपने दफ़्तर से तो उसके घर में अगर माँ हो, बहन हो या भाभी हो कोई भी हों लड़के के लिए पानी लाना, चाय बना कर देना, खाना परोस कर देना। ये आज भी हर घर के यही रीति रिवाज़ हैं। लेकिन महिला अगर बीमार हो या घर पर ना हों तब भी उस घर में पुरूष, दफ़्तर से आई महिला के लिए न पानी, न चाय और ना ही खाना परोस कर देते हैं। ये उदाहण सिर्फ़ एक उदाहरण नहीं है महिलाओं के अंदर की वो सम्वेदना है जो कहती हैं कि हमें बराबरी का हक़ तो मिला लेकिन इसके आड में बहुत अच्छे से शोषण भी किया जा रहा है। महिलाओं के काम को बढ़ा दिया गया घर के काम के साथ पैसे भी कमाओ लेकिन पुरुषों को ये बचपन से ये नहीं सिखाया गया कि आपको भी घर के कामकाज़ आने चाहिए। आप भी बरारबरी दिखाओ महिलाओं के साथ। तब बात सही मायनों में बराबरी का समझा जाएगा। ये तो महिलाओं को आगे बढ़ाकर सारे बोझ ही उनके सर पर डाल दिया गया है। आज जैसे महिला सशक्तिकरण का अभियान चलाया जा रहा है उसी तरह से पुरुष सशक्तिकरण का भी अभियान चलाया जाना चाइए। तभी हम गर्व से कह सकेंगे कि हमें बराबरी का दर्ज़ा मिला है अन्यथा ये महिलाओं के साथ अन्याय है।

Friday, May 17, 2019

रिश्तों का समीकरण



आज के आधुनिक युग में लोग सिर्फ भाग रहे हैं लेकिन कहाँ ये बात तो वो भी नही जानते हैं. लोग अपनी जिंदगी में सब कुछ पाना चाहते हैं लेकिन उसके लिए जोखिम उठाना नहीं चाहते हैं. चाहे वो पढाई हो या नौकरी या फिर निजी जिंदगी में अपने रिश्ते. आखिर इसकी वजह क्या है? आइये हम इन कुछ बिन्दुओं पर प्रकाश डालते हैं.

नवीनतम शिक्षा बहुत उच्च हो गया है जिसके लिए ज्यादा धन लगाना और अधिक समय का भी लगाना जरुरी हो गया है तभी वो एक इन्सान अच्छे ओहदे को पा सकता है. जब एक बच्चा अपनी पढाई शुरू करता है तो उसकी उम्र महज़ 2 साल कि होती है जो कि प्ले स्कूल से जिंदगी कि शुरूवात होती है. तब माँ बाप उनके अच्छे भविष्य के लिए दोनों खूब मेहनत करते हैं. और हर वो जरुरत को पूरा करने कि कोशिश में भागते हैं कि मेरे बच्चे एक ऐसे बच्चे बन कर सबके सामने आए कि समाज में मेरा नाम हो. तब वो माँ बाप अपनी जिंदगी को भी भूल जाते हैं कि अपनी जिंदगी जीना कैसे है? और सिर्फ एक धुन लगी होती है सिर्फ रूपया कमाना. ये भी जरुरी है कि बिना रुपये जिंदगी कैसी होगी ये तो कल्पना भी नही कर सकते हैं लेकिन क्या वो अपनी जिंदगी जी रहे हैं? बच्चे बड़े हो रहे हैं उनको माँ बाप कि जरुरत है लेकिन वो केयर टेकर के पास पल बढ़ रहे हैं या नाना नानी के पास. दादा दादी के पास बहुत कम देखा जाता है क्योकि अगर वो उनके पास रहे तो बहु को भी रहना पड़ेगा तो इससे अच्छा है क्रेच या केयर टेकर के पास ही रख दिया जाए बच्चे को ताकि सास ससुर का काम करना न पड़े. ऐसी ही सोच कि ज्यादातर लडकियाँ हो गयी हैं. अब के ज़्यादातर बच्चे दादा दादी के साथ नहीं रहते क्योंकि उनकी माँ को सास ससुर के साथ रहना पसंद नहीं. ज्यादा कमाने कि होड़ में पति-पत्नी अपनी जिंदगी के हसीन पलों को खो देते हैं कि बच्चो के भविष्य का सवाल है. कुछ ऐसे दम्पति होते हैं कि अपना पति व्यस्त है तो क्या हुआ किसी और के साथ रिश्ते कायम कर लेती हैं और अगर बीवी पति को समय न दे पा रही हो तो पति कहीं और खुद को किसी के साथ रिश्ते बना लेते हैं. अब ऐसे में बच्चो को स्कूल के बाद घर पर अकेले ही बिताना पड़ता है. अगर कोई है उनके साथ तो जान पहचान का ही है कोई भी. माँ बाप थककर आते हैं उनसे ढंग से बात करने कि फुर्सत नही. बच्चे कहीं और दूसरा रास्ता अपनाते हैं. अच्छे बुरे के बारे में बताने के लिए कोई अपना नही, और  किसी भी तरह कि कोई भी घटना घाट जाती है अकेले होने क कारण. ऐसे में बच्चे भी अकेले और माँ बाप भी. जो एक पर्याप्त समय मिलना चाइये एक परिवार को वो तो मिल नही पता है. अब आगे बढ़ते हैं उन बच्चो के पास जो बच्चे थे अब बड़े हो गये हैं. वो कुछ अलग करना चाहते हैं कुछ पाने कि चाहत है. कुछ बनने कि चाहत है अच्छा मुकाम पाने की चहात है. अपनी एक वो जिंदगी भी जीना चाहते हैं जो कि एक स्वभाविक है. वो बच्चे शादी करना चाहते हैं घर बसना चाहते हैं लेकिन उनके आड़े आ जाती है एक अच्छी नौकरी... उफ्फ ये वही है कमबख्त है जो अपनी जिंदगी की उस ख़ुशी से वंचित हैं जिसे बच्चे जीना चाहते हैं. लेकिन अब उसका भी समाधान निकाला गया कि अपनी मर्ज़ी से लिव इन रिलेशनशिप में रह सकते हैं. ये बात तो सभी सब जानते हैं लेकिन बहुत हद तक ये अकेले रहने वाले घर से दूर रहने वाले लड़के लड़कियां अपना चुके हैं. वो समझते हैं कि शादी करना कोई जरुरी नही हम ऐसे भी तो जी सकते हैं लेकिन एक वक़्त पे आकर वो भी उनका साथ छूट जाता है. अब माँ बाप चाहते हैं कि अच्छे से पढाई कराई है तो अच्छे से जॉब में सेटल हो जाए तो सोचेंगे शादी के बारे में. तब अच्छा दहेज भी मिलेगा. ये सच है कि दहेज़ प्रथा अब भी चलन में है. बच्चे अपनी जिंदगी में मस्त हैं. माँ बाप को कुछ खबर तक नही कि आखिर बच्चो कि जिंदगी में चल क्या रहा है? क्योंकि बचपन से तो उन्हें खुद ही अकेले जीने को छोड़ दिया है.
लड़कियां शादी करना चाहती तो हैं लेकिन अपने दायित्यों को समझते हुए भी उसे पूरा करना नही चाहती जैसे माँ बनना पसंद है लेकिन माँ कि तरह बच्चों को पलना नहीं वो बच्चे किसी और के पास पलते हैं. बहु बनना पसंद तो है लेकिन कहलाना नहीं वो अब भी बेटी ही बन कर रहना चाहती हैं. बेटी का रोले और बहु का रोले दोनों अलग है ये बात समझने कि है जहाँ तक बेटी बहु के प्यार का सवाल है वो एक अलग मुद्दा है. औरतों को गर्व होना चाहिए कि मै एक बहु हूँ कसी कि बीवी हूँ किसी कि माँ हूँ लेकिन कहलाना तो पसंद है लेकिन उस जॉब रोल को निभाना पसंद नही. सास बनना तो पसंद है लेकिन सास का फ़र्ज़ निभाना नही. बेटा भी आज के युग में कुछ कम नहीं हैं वो भी अपने ही माँ बाप को नहीं सेवा करना चाहते हैं और सारा इलज़ाम लगा देते है कि बीवी बच्चो को तो छोड़ नही सकते क्या करें मज़बूरी है अलग होना ही पड़ेगा क्योंकि बहु साथ नही रहना चाहती. आजकल ये आम बात हो गयी है. रिश्ते आये दिन बिखरते जा रहे हैं.
जब माँ बाप बूढ़े हो जाते हैं तो सोचते हैं कि हमें तो अब बच्चे सेवा करेंगे क्योंकि हमने इनके लिए पूरी जिंदगी लगा दी. लेकिन जब वो बच्चे बड़े होकर एक अच्छे ओहदे को पाकर शादी के बाद अपनी जिंदगी कि शुरूवात करते हैं तो वो भी अपने माँ बाप कि तरह अपनी जिंदगी में दोहराते हैं और माँ बाप को केयर टेकर कि जगह वृद्धा आश्रम में छोड़ देते हैं.
यही हाल ऑफिस में भी है. प्रमोशन तो चाइये और सैलरी भी ज्यादा चाइये लेकिन काम कम ही करना पड़े. सिर्फ ओहदे बदलते जाएँ सालों साल लेकिन काम कम होता जाए. अब निजी जिंदगी को प्रोफेशन से क्यों जोड़ा ये समझने वाली बात है... जैसे प्रोडक्शन लाइफ से अस्सिस्टेंट टीम लीड का बनना फिर टीम लीड का उसके बाद असिस्टेंट मेनेजर फिर मेनेजर फिर उससे भी ऊपर तक जाने तक का सफ़र तय करना ये तो है प्रोफेशनल लाइफ. यहाँ पर सब अपने काम को और अपने पद को सैलरी को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ते हैं. न चाहते हुए भी अपने टारगेट को पूरा करते हैं ताकि पद न छीन ली जाए. नौकरी से निकल न दिया जाए.
अब समझते हैं रिश्तों के दायित्वों को..
पहले तो बेटा या बेटी का पद मिलता है फिर बहु और दामाद का, फिर सास ससुर का, फिर दादा दादी या नाना नानी का पद मिलता है. लेकिन यहाँ तो किसी भी रिश्ते को उस पद से हटाने का कोई डर नही होता जो दिल में आये वो करते हैं.
अगर हम अपने रिश्ते को एक जॉब रोल कि तरह लें और समीकरण बनाया जाए तो कोई रिश्ता ख़राब नहीं होगा और न ही टूटेगा न बिखेगा. जिसको जिसकी जितनी जरुरत है वो अपने रिश्तों को समय और साथ दोनों देंगे और रिश्तों कि खूबसूरती को समझेंगे.