ऐसा इसलिए होता है कि जन्म के साथ ही लिंग भेद का पाठ पढ़ाया जाना आम बात है। हर बात की शिक्षा सिर्फ लड़कियों को दी जाती है तभी वो उम्र से पहले समझदार और विवेक से भरी होती हैं या यूँ कहें कि लड़कियों को सिर्फ दबाया और डराया गया है और किसी भी बात को रखना अपने मन में उठ रहे सवाल को भी कहना मुँहफट या बेशर्म की श्रेणी में रख दिया जाता है लेकिन उन पर घर से ही इतना दबाव पड़ता है कि वो बिना बताए ही बहुत कुछ समझने लगती हैं। कोई अलग से गुण नहीं होता। जैसी सोच पैदा करेंगे लड़के लड़कियां वैसा ही करेंगे। सोच बदलने पर ध्यान देना अति आवश्यक है। आज भी आप बैठकर अपने माता-पिता भाई-बहन से सहजता से सेक्स से जुड़ी समस्याओं पर बात नहीं करते होंगे उसके लिए एक प्रेमी/प्रेमिका या पति/पत्नि का सहारा लेंगे लेकिन कुछ बातें जो माँ-बाप और अपनों से सरल भाषा में मिलनी चाहिए आज भी वो समाज नहीं बन पाया है। मात्र सेक्स शब्द बोलना ही एक टैबू है जो मिटाना है। बाकी धीरे-धीरे कम होगा तब मानव विकृति की समस्या पर निजात पाया जा सकता है। उस तबके की बात करूँगी जो कहने को बहुत पढ़े-लिखे हैं फिर भी अब तक माहौल सही नहीं बना पाए हैं। बीमारी अगर सर्दी, खाँसी, बुख़ार हो या कैंसर इन सब पर बहुत अच्छे से चर्चा कर लेते हैं परिवार के लोग या ज़रूरत पड़ने पर पूरा समाज मिलकर। लेकिन हैरानी की बात ये है कि जब कोई लड़की या लड़का मानसिक तौर पर टूट रहे हों तो उसका इलाज़ या काउंसलिंग तो बहुत दूर की बात है उस पर सोच विचार तक नहीं करते। आखिर क्यों? सोचिएगा.. इस विषय पर चर्चा ना होने के कारण हम बच्चों को एक ऐसे परिवेश में धकेल दिए हैं जो मानसिक तौर पर कुंठित, संकुचित व विवेकहीन हो गए हैं। क्या ये विषय इतना संवेदनशील नहीं है? आज हर कोई डर के माहौल में जीने लगे हैं कि कब हमारी बेटी की आबरू तार तार हो जाए? कैसे बचाया जाए? लेकिन इसका विकल्प नहीं मिल पाया है। सिर्फ़ हम बेटियों को ही पढ़ाते और समझाते रहेंगे तो एक तरफ़ा कैसे काम चलेगा? बड़े ही ज़ोर शोर से आत्म सुरक्षा की ट्रेनिंग दी जा रही हैं लेकिन क्या आत्म निर्भर हो जाएँगी बेटियाँ? अपनी सुरक्षा अपने हाथ में हो ये अच्छी बात है लेकिन जब लड़कों को भी इसकी सही समय पर सही जानकारी दी जाए तो शायद ऐसा दिन ही ना आए जो सुनने को मिले कि आज एक लड़की के साथ जघन्य अपराध हुआ है। जैसा कि अध्ययन से पता चला है कि महिलाओं में सेक्स की इच्छा पुरुषों से अधिक होती है लेकिन बलात्कार करने के मामले में लड़कों का नाम ज़्यादा है लड़कियों का होना चाहिए था? लेकिन ऐसा नहीं है। सोचिये क्यों? बचपन से सीख मिलती है ऐसे रहना चाहिए वैसे रहना चाहिए तुम अब बड़ी हो गयी हो। इन बातों का ख़याल रखा करो। लेकिन क्या ऐसे शब्द कभी लड़कों को सुनने को मिलता है जितना दिन-रात लड़कियों को ट्रेनिंग मिलती है। अगर समाज को बदलना है खासकर महिलाओं पर हो रहे जघन्य अपराध को लेकर तो पहले आप सब अपने घरों में माहौल को बदलना शुरू करें। बच्चों के बीच उम्र के हिसाब से जानकारी देना शुरू करें। सोच को बदलने का प्रयास करें। हमारी शीरीरिक बनावट दो तरह की है लेकिन काम और क्रिया सब एक जैसे हैं। जिस तरह से बीमारी या फ़िटनेस को लेकर ख़ासा ख़्याल रखते हैं आप सबको बच्चों के प्रति मानसिक तनाव और उठने वाले हर सवाल का जवाब भी आप ही को बनना है ना कि कोई और उसे बताये। जब ये सब बातें ख़ास से आम नहीं बनेंगी तब तक हम सभ्य समाज का निर्माण नहीं कर सकते। लोग सोचते हैं कि इस पर बात करना असभ्य लोगों का काम है छी..छी.. लेकिन जब कोई घटना घट जाती है तब वाक़ई छी.. छी.. का रूप ले लेता है। सोचिए कि आपको कब छी.. छी.. सुनना सुनाना पसन्द होगा? सारे सवाल के जवाब आपके पास हैं। मेरा काम तो सिर्फ़ आईना दिखाना है। सोच बदलिए घर बदलेगा तभी समाज और देश बदलेगा।
Saturday, January 18, 2020
पढ़े-लिखे समाज में इतनी दरिंदगी... आख़िर क्यों?
ऐसा इसलिए होता है कि जन्म के साथ ही लिंग भेद का पाठ पढ़ाया जाना आम बात है। हर बात की शिक्षा सिर्फ लड़कियों को दी जाती है तभी वो उम्र से पहले समझदार और विवेक से भरी होती हैं या यूँ कहें कि लड़कियों को सिर्फ दबाया और डराया गया है और किसी भी बात को रखना अपने मन में उठ रहे सवाल को भी कहना मुँहफट या बेशर्म की श्रेणी में रख दिया जाता है लेकिन उन पर घर से ही इतना दबाव पड़ता है कि वो बिना बताए ही बहुत कुछ समझने लगती हैं। कोई अलग से गुण नहीं होता। जैसी सोच पैदा करेंगे लड़के लड़कियां वैसा ही करेंगे। सोच बदलने पर ध्यान देना अति आवश्यक है। आज भी आप बैठकर अपने माता-पिता भाई-बहन से सहजता से सेक्स से जुड़ी समस्याओं पर बात नहीं करते होंगे उसके लिए एक प्रेमी/प्रेमिका या पति/पत्नि का सहारा लेंगे लेकिन कुछ बातें जो माँ-बाप और अपनों से सरल भाषा में मिलनी चाहिए आज भी वो समाज नहीं बन पाया है। मात्र सेक्स शब्द बोलना ही एक टैबू है जो मिटाना है। बाकी धीरे-धीरे कम होगा तब मानव विकृति की समस्या पर निजात पाया जा सकता है। उस तबके की बात करूँगी जो कहने को बहुत पढ़े-लिखे हैं फिर भी अब तक माहौल सही नहीं बना पाए हैं। बीमारी अगर सर्दी, खाँसी, बुख़ार हो या कैंसर इन सब पर बहुत अच्छे से चर्चा कर लेते हैं परिवार के लोग या ज़रूरत पड़ने पर पूरा समाज मिलकर। लेकिन हैरानी की बात ये है कि जब कोई लड़की या लड़का मानसिक तौर पर टूट रहे हों तो उसका इलाज़ या काउंसलिंग तो बहुत दूर की बात है उस पर सोच विचार तक नहीं करते। आखिर क्यों? सोचिएगा.. इस विषय पर चर्चा ना होने के कारण हम बच्चों को एक ऐसे परिवेश में धकेल दिए हैं जो मानसिक तौर पर कुंठित, संकुचित व विवेकहीन हो गए हैं। क्या ये विषय इतना संवेदनशील नहीं है? आज हर कोई डर के माहौल में जीने लगे हैं कि कब हमारी बेटी की आबरू तार तार हो जाए? कैसे बचाया जाए? लेकिन इसका विकल्प नहीं मिल पाया है। सिर्फ़ हम बेटियों को ही पढ़ाते और समझाते रहेंगे तो एक तरफ़ा कैसे काम चलेगा? बड़े ही ज़ोर शोर से आत्म सुरक्षा की ट्रेनिंग दी जा रही हैं लेकिन क्या आत्म निर्भर हो जाएँगी बेटियाँ? अपनी सुरक्षा अपने हाथ में हो ये अच्छी बात है लेकिन जब लड़कों को भी इसकी सही समय पर सही जानकारी दी जाए तो शायद ऐसा दिन ही ना आए जो सुनने को मिले कि आज एक लड़की के साथ जघन्य अपराध हुआ है। जैसा कि अध्ययन से पता चला है कि महिलाओं में सेक्स की इच्छा पुरुषों से अधिक होती है लेकिन बलात्कार करने के मामले में लड़कों का नाम ज़्यादा है लड़कियों का होना चाहिए था? लेकिन ऐसा नहीं है। सोचिये क्यों? बचपन से सीख मिलती है ऐसे रहना चाहिए वैसे रहना चाहिए तुम अब बड़ी हो गयी हो। इन बातों का ख़याल रखा करो। लेकिन क्या ऐसे शब्द कभी लड़कों को सुनने को मिलता है जितना दिन-रात लड़कियों को ट्रेनिंग मिलती है। अगर समाज को बदलना है खासकर महिलाओं पर हो रहे जघन्य अपराध को लेकर तो पहले आप सब अपने घरों में माहौल को बदलना शुरू करें। बच्चों के बीच उम्र के हिसाब से जानकारी देना शुरू करें। सोच को बदलने का प्रयास करें। हमारी शीरीरिक बनावट दो तरह की है लेकिन काम और क्रिया सब एक जैसे हैं। जिस तरह से बीमारी या फ़िटनेस को लेकर ख़ासा ख़्याल रखते हैं आप सबको बच्चों के प्रति मानसिक तनाव और उठने वाले हर सवाल का जवाब भी आप ही को बनना है ना कि कोई और उसे बताये। जब ये सब बातें ख़ास से आम नहीं बनेंगी तब तक हम सभ्य समाज का निर्माण नहीं कर सकते। लोग सोचते हैं कि इस पर बात करना असभ्य लोगों का काम है छी..छी.. लेकिन जब कोई घटना घट जाती है तब वाक़ई छी.. छी.. का रूप ले लेता है। सोचिए कि आपको कब छी.. छी.. सुनना सुनाना पसन्द होगा? सारे सवाल के जवाब आपके पास हैं। मेरा काम तो सिर्फ़ आईना दिखाना है। सोच बदलिए घर बदलेगा तभी समाज और देश बदलेगा।
